बच्चों की जिंदगी से कब तक खिलवाड़? सोनो स्कूल वैन हादसे ने खोली सुरक्षा व्यवस्था की पोल
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जमुई जिले के सोनो प्रखंड अंतर्गत सोनो चौक पर बुधवार को स्कूली बच्चों से भरी मैजिक वैन का रेडिएटर अचानक फटने से छह बच्चे झुलस गये। गर्म पानी की चपेट में आने से दो बच्चों की स्थिति गंभीर बतायी गयी, जिन्हें बेहतर इलाज के लिए निजी नर्सिंग होम ले जाया गया। घटना के बाद स्थानीय लोगों और राहगीरों ने तत्परता दिखाते हुए बच्चों को वाहन से बाहर निकाला और अस्पताल पहुंचाया। हादसे के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस वाहन में स्कूली बच्चों को ले जाया जा रहा था, क्या उसकी नियमित सर्विसिंग करायी गयी थी? क्या वाहन के सभी पार्ट्स दुरुस्त थे? क्या उसकी फिटनेस की समय पर जांच हुई थी? अगर वाहन की नियमित जांच होती रही थी तो रेडिएटर की ऐसी स्थिति कैसे बनी, जिससे बच्चों की जान पर बन आयी?
बड़े स्कूल, लेकिन बच्चों की सुरक्षा कितनी बड़ी प्राथमिकता? अभिभावक अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा दिलाने के लिए निजी स्कूलों में भेजते हैं और स्कूल वाहन के लिए अलग से शुल्क भी देते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि स्कूल संचालकों की जिम्मेदारी केवल बच्चों को स्कूल में शिक्षा देने तक है या उन्हें सुरक्षित तरीके से घर से स्कूल और स्कूल से घर पहुंचाने की भी है? जिले में कई निजी स्कूलों के वाहनों को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। कहीं निर्धारित क्षमता से अधिक बच्चों को बैठाने की शिकायत सामने आती है, तो कहीं पुराने और जर्जर वाहनों के इस्तेमाल का आरोप लगता है। कुछ वाहनों में नंबर प्लेट, बैकलाइट और अन्य जरूरी सुरक्षा उपकरणों की स्थिति को लेकर भी सवाल उठाए जाते रहे हैं। ऐसे में सोनो की घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या जिला प्रशासन और परिवहन विभाग सभी स्कूल वाहनों की धरातल पर जांच कर रहा है या किसी बड़े हादसे का इंतजार किया जा रहा है?
जमुई स्टार न्यूज’ लगातार उठाता रहा है सवाल स्कूल वाहनों में बच्चों की सुरक्षा को लेकर जमुई स्टार न्यूज’ द्वारा लगातार सवाल उठाए जाते रहे हैं। क्षमता से अधिक बच्चों को बैठाने, पुराने वाहनों के इस्तेमाल और सुरक्षा मानकों की अनदेखी जैसे मुद्दों को लेकर खबरों के माध्यम से प्रशासन और संबंधित विभाग का ध्यान भी आकृष्ट कराया जाता रहा है। इसके बावजूद यदि स्कूल वाहनों की नियमित और सख्त जांच नहीं होती है तो सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर प्रशासन की नींद कब खुलेगी? क्या किसी बड़े हादसे के बाद ही व्यवस्था हरकत में आएगी?
हादसे के बाद ही क्यों जागता है सिस्टम? सोनो की घटना के बाद पुलिस ने स्कूल संचालकों और वाहन चालकों को निर्धारित क्षमता से अधिक बच्चों को नहीं बैठाने तथा वाहनों की समय-समय पर जांच कराने का निर्देश दिया है। लेकिन सवाल यह है कि ये निर्देश हादसे से पहले क्यों प्रभावी नहीं होते? अभिभावकों का कहना है कि बच्चों को स्कूल तक पहुंचाने वाले वाहनों की फिटनेस और सुरक्षा में किसी भी तरह की लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जानी चाहिए। प्रशासन को केवल कागजों पर जांच करने के बजाय सड़क पर उतरकर स्कूल वाहनों की वास्तविक स्थिति की जांच करनी चाहिए।
स्कूल संगठनों की चुप्पी पर भी सवाल हादसे के बाद स्कूलों से जुड़े संगठनों की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। नामांकन के समय सक्रिय रहने वाले संगठन बच्चों की सुरक्षा से जुड़े गंभीर मामलों में कितनी सक्रिय भूमिका निभाते हैं, यह भी चर्चा का विषय है। बच्चों की सुरक्षा किसी स्कूल, संगठन या प्रशासन की औपचारिक जिम्मेदारी भर नहीं, बल्कि सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए। सोनो की घटना एक चेतावनी है। जरूरत इस बात की है कि जिले में संचालित सभी स्कूल वाहनों की फिटनेस, परमिट, बीमा, चालक के लाइसेंस, निर्धारित क्षमता और जरूरी सुरक्षा उपकरणों की व्यापक जांच करायी जाए। ताकि अगली बार प्रशासन को किसी बड़े हादसे के बाद कार्रवाई के लिए मजबूर न होना पड़े और किसी अभिभावक को अपने बच्चे की सुरक्षा के लिए सवाल लेकर सड़क पर न उतरना पड़े।





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