कभी घर की दहलीज से बाहर निकलना था चुनौती, आज केवड़िया के राष्ट्रीय एकता दिवस समारोह की बनीं साक्षी; चोरमारा-गुरमाहा की बेटियों की उड़ान ने दिखाई बदलते जमुई की तस्वीर
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जमुई। जिले के पूर्व नक्सल प्रभावित क्षेत्र चोरमारा और गुरमाहा की बेटियों ने गुजरात के केवड़िया स्थित एकता नगर में आयोजित राष्ट्रीय एकता दिवस समारोह में शामिल होकर एक नई उपलब्धि हासिल की है। देश की एकता और अखंडता को समर्पित राष्ट्रीय स्तर के इस महत्वपूर्ण आयोजन में उनकी सहभागिता न केवल उनके लिए यादगार अनुभव रही, बल्कि जमुई में बदलते सामाजिक और विकासात्मक परिवेश की एक सकारात्मक तस्वीर भी सामने लेकर आई। वापसी के दौरान इन बेटियों ने ट्रेन में भी अपनी सामाजिक जिम्मेदारी का परिचय दिया। भ्रूण हत्या जैसी गंभीर सामाजिक कुरीति के खिलाफ गीतों और जागरूकता संदेशों के माध्यम से उन्होंने सहयात्रियों को जागरूक किया। इस प्रकार उनकी यात्रा केवल राष्ट्रीय समारोह में भागीदारी तक सीमित नहीं रही, बल्कि उन्होंने सामाजिक बदलाव का संदेश भी लोगों तक पहुंचाया। इन बेटियों की यह उपलब्धि इसलिए भी खास है, क्योंकि कभी चोरमारा और गुरमाहा जैसे गांवों की पहचान नक्सल गतिविधियों, भय और असुरक्षा से जुड़ी रही थी। उन परिस्थितियों में बच्चियों के लिए गांव की दहलीज पार कर बाहर निकलना भी बड़ी चुनौती माना जाता था। लेकिन आज उसी क्षेत्र की बेटियां मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण कर रही हैं, राष्ट्रीय आयोजनों में भाग ले रही हैं और अपने अनुभवों से समाज को नई दिशा देने का प्रयास कर रही हैं।
इस बदलाव के पीछे जिला प्रशासन की निरंतर मेहनत और संवेदनशील पहल की अहम भूमिका रही है। जिलाधिकारी नवीन कुमार के नेतृत्व में जिला प्रशासन द्वारा पिछले एक वर्ष से इन क्षेत्रों में सुरक्षा, विश्वास बहाली, शिक्षा और विकास की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। वहीं, डॉ. मोनिका की सक्रिय भूमिका, निरंतर प्रयास और बेटियों को आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करने की पहल भी अब सकारात्मक परिणाम देती दिखाई दे रही है। केंद्र सरकार के नक्सलवाद उन्मूलन अभियान के साथ जिला प्रशासन की कोशिशों का असर अब इन गांवों की नई पीढ़ी के जीवन में नजर आने लगा है। सुरक्षा और विश्वास का माहौल मजबूत होने के साथ शिक्षा, जागरूकता और अवसरों के नए रास्ते खुल रहे हैं।
चोरमारा और गुरमाहा की बेटियों का केवड़िया पहुंचना महज एक यात्रा नहीं, बल्कि वर्षों से बदलाव की प्रतीक्षा कर रहे इन गांवों के लिए उम्मीद का संदेश है। यह इस बात का संकेत है कि जब प्रशासनिक इच्छाशक्ति, जमीनी मेहनत और समाज की भागीदारी एक साथ आती है, तो बदलाव केवल सरकारी आंकड़ों में नहीं, बल्कि लोगों के जीवन में दिखाई देने लगता है। कभी जिन बेटियों के लिए घर की दहलीज पार करना चुनौती था, आज वही बेटियां राष्ट्रीय मंच पर जमुई का प्रतिनिधित्व कर रही हैं। निश्चित रूप से जिलाधिकारी और डॉ. मोनिका सहित पूरी टीम की मेहनत अब रंग लाती दिखाई दे रही है
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